Sunday, August 30, 2009

डेमोक्रेसी Vs मोदी का गुजरात


अपने सम्विधान पर बचपन से हम २६ जनवरी को खूब गर्वित इतराते है, उसपे पालन कर जीने मरने की कसमे खाते है! कमाल है सरकारे ही अब सम्विधान की पर्वाह नही करती.....
कारण?.....

खैर..... एक ताजा वाक्या उदाहरण के तौर पर ले,

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता...

गुजरात मे मोदी साहब ने जसवंत सिंह की पुस्तक को प्रतिबन्धित कर दिया है!आज जब जस्वंत जी अपनी बात कहते है तो अपने ही उनका मुंह बन्द करने पे आमादा है!
यानी......
कहाँ है भई सम्विधान मे उल्लेखित Article 19 अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता?
है तो कहाँ ....? और है तो किसके लिये.....?

जसवन्त जी की पुस्तक मैने अभी तक पढी नही है बगैर इसके मै कुछ बाते ठीक ठीक जानता हूँ!

जसवंत जी जो भी कह रहे है ये उनके अपने विचार है ...क्या जसवंत जी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नही है? और गुजरात की पढी लिखी जनता को इस प्रकार पुस्तक से वंचित करना क्या गुजराती बुद्दिजीवी वर्ग के अधिकारों का हनन नही है?

भाई पढने दीजिये सही गलत की विवेचना तो वे पढ्ने के बाद ही करेंगे!

क्या इस तरह मोदी जी जसवंत जी का मुह बन्द करने के साथ गुजरातियों के कान भी बन्द नही कर रहे है?

मोदी जी जिस राम राज को लाने की बात करते है उसमे अब मुहँ बन्द किया जायेगा...? ऐसी कौन सी डेमोक्रेसी भाई? और कहाँ पाई जाती है...?

अब तक खुद के लिये मोदी जी कहते थे मै तो बोलुंगा जिसे नही सुनना वो अपना कान बन्द कर ले...
तो जस्वनंत जी का मुहँ क्योँ बन्द करवा रहे है?
आज जब गुजरात मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रष्नवाचक चिन्ह लग गया है,तो कल वहाँ लोकतंत्र पर भी सीधा प्रष्नवाचक चिन्ह लग सकता है!

क्या आप को नही लगता इस तरह मोदी जी सम्विधान मे उल्लेखित Article 19 अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता का हनन कर रहे है?


Saturday, August 22, 2009

मुर्दा जिन्ना का ज़िन्दा जिन्न


विभाजन और उसके तहत मौते "गदर" जिम्मेदार हिन्दु और मुसलमान खुद रहे हैं!

रही बात जिन्ना की जो उन्हों ने जो किया सही-गलत ये कथित सेकुलर ढोंग से बाहर आ कर वास्तविक परिपेक्ष को देखते हुए बात करने का विषय है!

जिन्ना की औकात कभी निर्णायक की नही थी प्रथम दोष उनका है ("चाहे जिस कारण हो") जिन्होंने सहमती दी और निर्णय घोषित किया!

खैर वो रही बीती बात...अब जिसे भाये वो लकीर पीटे!

मै निवेदन कर पूछता हूँ आप सब गणमान्य जनों से कि आज वो कौन सा राजनेता है जिसका जिन्न जिन्ना से बडा नही है?

जिन्ना ने हिन्दु और मुसलमान में बाँटा "ठीक है" तो अब वो कौन है जो SC ST OBC Backward कोटे में हिन्दु मुसलमान दोनो को छिन्न भिन्न कर रहे है? कह दीजिये उनका जिन्न जिन्ना से छोटा है!!!

Friday, August 21, 2009

आज भी हर चौथा भारतीय भूखा सोता है


जब भारत विश्व शक्ति बनकर उभरने का दावा कर रहा है,ऐसे समय देश में हर चौथा व्यक्ति भूखा है. भारत में भूख और अनाज की उपलब्धता पर भारत के एक ग़ैर-सरकारी संगठन की ताज़ा रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है.

यह आंकड़े नवदान्य ट्रस्ट द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट का हिस्सा हैं जिसमें कहा गया है कि 'बढ़ती महंगाई और सरकारों द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हाल के दिनों में फैलाई गई अव्यवस्था ने स्थिति को और भी बदतर कर दिया है.'

ग़ैर-सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में तकरीबन 21 करोड़ से अधिक जनसँख्या को भर पेट भोजन नहीं मिल पाता है. संख्या के अनुपात में यह अफ़्रीका के सबसे गरीब देशों से भी ज़्यादा है.

'भूख के कारण' नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में खाद्य सामग्री के वितरण में निजी कंपनियों के बढ़ते दख़ल ने खाने पीने की चीजों की कीमतें बढ़ा दी हैं.

उदारीकरण के बाद से सरकार ने 'सही ज़रूरतमंदों को ही छूट' के नाम पर सिर्फ़ बहुत गरीब वर्गों को ही सार्वजानिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ते अनाज देने की सुविधा जारी रखी है.

पहले सस्ते दामों पर खाने पीने के सामान की सुविधा सभी नागरिकों को थी. अब यह सुविधा जनसँख्या के सिर्फ़ एक छोटे वर्ग को हो मिल रही है. एक अनुमान के मुताबिक गरीबों में भी ये सुविधा केवल 10 प्रतिशत लोगों को ही उपलब्ध है.

ट्रस्ट की प्रमुख वंदना शिवा के अनुसार "भले ही सत्ताधारी वर्ग और देश का एक वर्ग जीडीपी यानी सकल घरेलु उत्पाद को बढ़ाने को ही सबसे अहम काम समझ रहा है पर सच तो यह है कि एक आम आदमी को प्रति वर्ष मिलने वाली खाद्य सामग्री पिछले 10 बरसों के भीतर 34 किलो कम हो गई है."


उनके अनुसार वर्ष 1999 के आसपास भारत में खाद्य सामग्री की प्रति व्यक्ति सालाना खपत 186 किलोग्राम थी जो साल 2001 तक 152 किलोग्राम जा पहुँची.

भारत में आर्थिक उदारीकरण का काम 90 के दशक में शुरु हुआ था. तब केंद्र में कांग्रेस पार्टी की नरसिंह राव सरकार थी. पिछले पांच बरसों में रिपोर्ट के अनुसार गरीबों को मिलने वाली खाद्य सामग्री में भारी कमी आई है.

'भूख के कारण'

ट्रस्ट के अनुसार खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों की सच्चाई को छिपाने के लिए सरकार ने खाद्य पदार्थों को स्टील और धातुओं की कीमतों के आकलन वाले वर्ग में डाल दिया है, जिनकी कीमतें पिछले दिनों तेज़ी से गिरी हैं. इस तरह खाने पीने की वस्तुओं की थोक कीमतें में गिरावट तो देखी गई है लेकिन असल में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ी हैं.

सालाना महंगाई जिस फ़ार्मूले से आंकी जाती हैं उसमें ज़रुरत के सामानों के अलग अलग वर्ग तैयार किए गए हैं जिसमें हाल की कीमतों की तुलना के आधार पर एक महँगाई दर आँकी जाती है.

इससे खाने पीने की वस्तुओं पर सरकार द्वारा दी जाने वाली छूट यानी सब्सिडी में भी इज़ाफ़ा हुआ है. आर्थिक उदारीकरण के पहले दी जाने वाली सब्सिडी 2450 करोड़ रुपए थी जो पिछले वित्तीय वर्ष में बढ़कर 32667 करोड़ रुपए हो गई है. कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि अगले साल खाद्य सामग्री पर दी जाने वाली कुल छूट 50,000 करोड़ रूपए हो जाएगी.

वंदना शिवा कहती हैं, "हम अपने लोगों को भूखा रखने के लिए ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं."

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को हर एक नागरिक के लिए सार्वजानिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था करनी होगी जिसका नियंत्रण स्थानीय स्तर पर किया जाए. साथ ही एक ऐसी कृषि व्यवस्था को दोबारा बढ़ावा देना होगा जहाँ केवल 'कैश क्रौप पर ज़ोर न होकर पहले की तरह हर तरह के अनाज उपजाने को बढ़ावा दिया.

रिपोर्ट का दावा है कि हाल के बरसों में अनाज उगाने वाली 80 लाख हेक्टेअर भूमि पर एक्सपोर्ट की जाने वाले सामग्री उगानी शुरू कर दी गई है जबकि एक करोड़ हेक्टेअर से ज़्यादा ऐसी ज़मीन पर जैविक ईधन पैदा करने वाले पेड़ लगा दिए गए हैं.

रिपोर्ट के अनुसार विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए ली जाने वाली ज़मीनों से कृषि क्षेत्र पर दबाव और बढ़ेगा.

राजनेता


क्या आप किसी ऐसे राजनेता को जानते हैं जिसनें अपनी औलादों को सेना में भरती होनें के लियॆ प्रेरित किया हो ?

Wednesday, September 19, 2007

अनिवासी पूर्वांचली बाटी चोखा कैसे बनाये

बाटी के लिये सामग्री
*४ कप गेहु का आटा ठन्डे पानी से गून्द ले!
बाटी मे भरने के लिये सामग्री
१ कप सत्तु,
२ टेबल स्पून लाल मिर्चे के अचार वाला सरसों का तेल
२ चुटकी हींग
१ टी स्पून अज्वाइन
१ टी स्पून मंगरैल
१ बडा़ प्याज़ बारीक काटा हुआ
१० लहसुन के कोये
१ टी स्पून निम्बू का रस
नमक स्वाद अनुसार।
सारी सामग्री को अच्छी तरह मसल कर मिला लें और गूँदे हुए आँटे मे भर के गोलाकार लोईयाँ बना लें और इन्हे गर्मओवन में मद्धम आँच पर ५ मिनट तक और इसके बाद हल्का भूरा होने तक धीमी आँच मे पकायें।

चोखा के लिये सामग्री
१ बडा़ बैगन
२ टमाटर २ प्याज़ बारीक कटा हुआ
२ बडे आलू
१० कोए लेह्सुन
४ हरी मिर्च बारीक कटा हुआ
१ टी स्पून निम्बू का रस
नमक और धनिया पत्ती अन्दाज़ से।
आलू,बैगन(इसमें लहसुन पिरा लें),टमाटर ओवन में पका लें. अब पके आलू और बैगन को छील के टमाटर के साथ और बाकी सामग्री के साथ अच्छी तरह मिला लें ,चोखा तैयार है।
अब गर्म बाटी को मक्खन या देसी घी में डुबो कर चोखे के साथ परोसें

पंछी बोला चार पहर "रामकांत दीक्षित"


रामकांत दीक्षित जी की एक रोचक लघुकथा धुंधली यादों को समेट कर लिख रहा हूँ जो मैंने स्कूल के दिनों में पढी़ थी ।






पुराने समय की बात है। एक राजा था। वह बड़ा समझदार था और हर नई बात को जानने को इच्छुक रहता था। उसके महल के आंगनमें एक बकौली का पेड़ था। रात को रोज नियम से एक पक्षी उस पेड़ पर आकर बैठता और रात के चारों पहरों के लिए अलग-अलग चार तरह की बातें कहा करता। पहले पहर में कहता :
“किस मुख दूध पिलाऊं,
किस मुख दूध पिलाऊं”
दूसरा पहर लगते बोलता :
“ऐसा कहूं न दीख,
ऐसा कहूं न दीख !”
जब तीसरा पहर आता तो कहने लगता :
“अब हम करबू का,
अब हम करबू का ?”
जब चौथा पहर शुरू होता तो वह कहता :
“सब बम्मन मर जायें,
सब बम्मन मर जायें !”
राजा रोज रात को जागकर पक्षी के मुख से चारों पहरों की चार अलग-अलग बातें सुनता। सोचता, पक्षी क्या कहता ?पर उसकी समझ में कुछ न आता। राजा की चिन्ता बढ़ती गई। जब वह उसका अर्थ निकालने में असफल रहा तो हारकर उसने अपने पुरोहित को बुलाया। उसे सब हाल सुनाया और उससे पक्षी के प्रशनों का उत्तर पूछा। पुरोहित भी एक साथ उत्तर नहीं दे सका। उसने कुछ समय की मुलत मांगी और चिंतित होकर घर चला आया। उसके सिर में राजा की पूछी गई चारों बातें बराबर चक्कर काटती रहीं। वह बहुतेरा सोचता, पर उसे कोई जवाब न सूझता। अपने पति को हैरान देखकर ब्राह्रणी ने पूछा, “तुम इतने परेशान क्यों दीखते हो ? मुझे बताओ, बात क्या है ?”
ब्राह्राणी ने कहा, “क्या बताऊं ! एक बड़ी ही कठिन समस्या मेरे सामने आ खड़ी हुई है। राजा के महल का जो आंगन है, वहां रोज रात को एक पक्षी आता है और चारों पहरों मे नितय नियम से चार आलग-अलग बातें कहता है। राजा पक्षी की उन बातों का मतलब नहीं समझा तो उसने मुझसे उनका मतलब पूछा। पर पक्षी की पहेलियां मेरी समझ में भी नहीं आतीं। राजा को जाकर क्या जवाब दूं, बस इसी उधेड़-बुन में हूं।”
ब्राह्राणी बोली, “पक्षी कहता क्या है? जरा मुझे भी सुनाओ।”
ब्राह्राणी ने चारों पहरों की चारों बातें कह सुनायीं। सुनकर ब्राह्राणी बोली। “वाह, यह कौन कठिन बात है! इसका उत्तर तो मैं दे सकती हूं। चिंता मत करो। जाओ, राजा से जाकर कह दो कि पक्षी की बातों का मतलब मैं बताऊंगी।”
ब्राह्राण राजा के महल में गया और बोला, “महाराज, आप जो पक्षी के प्रश्नों के उत्तर जानना चाहते हैं, उनको मेरी स्त्री बता सकती है।”
पुरोहित की बात सुनकर राजा ने उसकी स्त्री को बुलाने के लिए पालकी भेजी। ब्राह्राणी आ गई। राजा-रानी ने उसे आदर से बिठाया। रात हुई तो पहले पहर पक्षी बोला:
“किस मुख दूध पिलाऊं,
किस मुख दूध पिलाऊं ?”
राजा ने कहा, “पंडितानी, सुन रही हो, पक्षी क्या बोलता है?”
वह बोली, “हां, महाराज ! सुन रहीं हूं। वह अधकट बात कहता है।”
राजा ने पूछा, “अधकट बात कैसी ?”
पंडितानी ने उत्तर दिया, “राजन्, सुनो, पूरी बात इस प्रकार है-
लंका में रावण भयो बीस भुजा दश शीश,
माता ओ की जा कहे, किस मुख दूध पिलाऊं।
किस मुख दूध पिलाऊं ?”
लंका में रावण ने जन्म लिया है, उसकी बीस भुजाएं हैं और दश शीश हैं। उसकी माता कहती है कि उसे उसके कौन-से मुख से दूध पिलाऊं?”
राज बोला, “बहुत ठीक ! बहुत ठीक ! तुमने सही अर्थ लगा लिया।”
दूसरा पहर हुआ तो पक्षी कहने लगा :
ऐसो कहूं न दीख,
ऐसो कहूं न दीख।
राजा बोला, ‘पंडितानी, इसका क्या अर्थ है ?”
पडितानी नेसमझाया, “महाराज ! सनो, पक्षी बोलता है :
“घर जम्ब नव दीप
बिना चिंता को आदमी,
ऐसो कहूं न दीख,
ऐसो कहूं न दीख !”
चारों दिशा, सारी पृथ्वी, नवखण्ड, सभी छान डालो, पर बिना चिंता का आदमी नहीं मिलेगा। मनुष्य को कोई-न-कोई चिंता हर समय लगी ही रहती है। कहिये, महाराज! सच है या नहीं ?”
राजा बोला, “तुम ठीक कहती हो।”
तीसरा पहर लगा तो पक्षी ने रोज की तरह अपी बात को दोहराया :
“अब हम करबू का,
अब हम करबू का ?”
ब्रह्राणी राजा से बोली, “महाराज, इसका मर्म भी मैं आपको बतला देती हूं। सुनिये:
पांच वर्ष की कन्या साठे दई ब्याह,
बैठी करम बिसूरती, अब हम करबू का,
अब हम करबू का।
पांच वर्ष की कन्या को साठ वर्ष के बूढ़े के गले बांध दो तो बेचारी अपना करम पीट कर यही कहेगी-‘अब हम करबू का, अब हम करबू का ?” सही है न, महाराज !”
राजा बोला, “पंडितानी, तुम्हारी यह बात भी सही लगी।”
चौथा पहर हुआ तो पक्षी ने चोंच खोली :
“सब बम्मन मर जायें,
सब बम्मन मर जायें !”
तभी राज ने ब्रह्राणी से कहा, “सुनो, पंडितानी, पक्षी जो कुछ कह रहा है, क्या वह उचित है ?”
ब्रहाणी मुस्कायी और कहने लगी, “महाराज ! मैंने पहले ही कहा है कि पक्षी अधकट बात कहता है। वह तो ऐसे सब ब्रह्राणों के मरने की बात कहता है :
विश्वा संगत जो करें सुरा मांस जो खायें,
बिना सपरे भोजन करें, वै सब बम्मन मर जायें
वै सब बम्मन मर जायें।
जो ब्राह्राण वेश्या की संगति करते हैं, सुरा ओर मांस का सेवन करते हैं और बिना स्नान किये भोजन करते हैं, ऐसे सब ब्रह्राणों का मर जाना ही उचित है। जब बोलिये, पक्षी का कहना ठीक है या नहीं ?”
राजा ने कहा, “तुम्हारी चारों बातें बावन तोला, पाव रत्ती ठीक लगीं। तुम्हारी बुद्वि धन्य है !”
राजा-रानी ने उसको बढ़िया कपड़े और गहने देकर मान-सम्मान से विदा किया। अब पुरोहित का आदर भी राजदरबार में पहले से अधिक बढ़ गया।

Thursday, August 2, 2007

राष्ट्रवादी "मूस मुटाये लोढा होए"

आज देश में जो कुछ भी गलत हो रहा हैं उसका दोष लोग नेता,सरकारी तंत्र,पुलिस और भ्रष्ट प्रशासन को देते हैं! "भ्रष्ट" यानी भ्रष्ट नेता,भ्रष्ट सरकारी तन्त्र, भ्रष्ट पुलिस... तमाम भ्रष्ट! तो समस्या जन्म लेती है भ्रष्ट आचरण से यानी इन सभी के पीछे है भ्रष्टाचार! और भ्रष्टाचार क्यो है? नैतिक मूल्यों की कमी से !..... राष्ट्रवादी मूल्यों के अव्मूल्यन सें !.... देश में IAS, IPS, मंत्री, नेता,वैग्यानिक,सैनिक,डाँक्टर आदि आदि हज़ार नौकरीवर,पेशेवर,विशेषग्यवर हैं जिनकी इस देश में कोई कमी नही हैं,पर जो कमी है वो इन सब मे समाहित है "भ्रष्टाचार" ! अब डाँक्टर बनना है तो बायोलाजी पढो, वैग्यानिक बनना है तो फ़िज़िक्स केमेस्ट्री पढो,IAS IPS बनना है तो सामान्य ग्यान, और नेता बनने को तो अंगूठा छाप भी चलेगा,उसे तो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपती बनने में भी कोई संवैधानिक बाधा नही है! तो भईया नैतिकता आये कहाँ से? Moralscience का विषय तो शिक्षा व्यवस्था मे आप की समझ की कली खिलने से पहले ही काफ़ूर हो चलता है(चौथी पाँचवी तक) उसके बाद पाईथागोरस प्रमेय, H2O यानी २ हाइड्रोजन १ आक्सीजन बनाता है पानी, प्लासी का युध्द और मेंढक चीरने के बाद ही बडे बडे सर्टिफ़िकेट मिलते है और उसके बाद ही IAS,IPS,वैग्यानिक,सैनिक,डाँक्टर बनने की प्रशस्ती प्राप्त होती है! डाँक्टर बनने में इस बात की कोई परीक्षा नही ली जाती की वो कितना नैतिक डाँक्टर बनेगा, इंजीनियर भी ब्रिज बनाने की काबिलियत तो समझा देता है पर कितने नैतिक रूप से? इसकी परीक्षा नही होती, इसी तरह IAS,IPS को भी ईमानदारी की कोई परीक्षा नही देनी पडती, रहा नेता ... तो वो पहले से ही हर शर्त से ऎग्ज़ेम्टेड है! एक तरफ़ से हमको तो लगता है कि "भ्रष्टाचार" से किसी को परेशानी नही है,क्योंकी जब जब देश दुनिया ने कोई परेशानी को पहचाना है उसका निदान भी ढूढा है... पोलियो के लिये ड्राप आयी,हेपेटाइटिस के लिये इंजेक्शन,और AIDS के लिये कन्डोम ! पर भ्रष्टाचार निरोध हेतु न ड्राप की खोज हो रही है ना इंजेक्शन की ना तो कोई कन्डोम ही इजाद किया जा रह है... और तो और बाबा रामदेव के पास भी कपाल्भाती जैसा कुछ कारगर इस विषय में नही है! तो "भ्रष्टाचार" मिटे तो मिटे कहाँ से? ऊपर से ग्लोब्लाइजेशन से आ रहा है और उपभोगतावाद इस समय देश की किसी को नही पडी, बजरंगलाल छत्तीसगढ़वाले जैसे और भी कुछ लोग ज़रूर इस पर काम कर रहे होंगे पर वे भी क्या करें राष्ट्रहित सोचने वालो की स्थिति तो है मानो "मूस मुटाये लोढा होए"