Friday, September 4, 2009

विरहिन की व्यथा


मेह की बूँद झरी बदरी,
पसरी पसरी सब देह पिरानी
भीजत खीझत छोड चले सखि
रीझत रीझत बात न मानी
सुनि अटारि कटारि लगे
सुन कोयल कीर मयूर की बानी
गाज गिरे ऐसे मौसम पे सखि
जहँ भीतर आग और बाहर पानी ......

3 comments:

Udan Tashtari said...

गाज गिरे ऐसे मौसम पे सखि
जहँ भीतर आग और बाहर पानी ......


--बहुत सुन्दर!

ajai said...

इसको कहते हैं --
सावन आग लगाये

vimal verma said...

बहुत किचकिचा के लिखा है आपने,लग रहा घर की याद कुछ ज़्यादा ही आ रही है....यहां अपना भी मन कचकचा गया है साथी...अच्छा लिखा है...... गाज गिरे ऐसे मौसम पे सखि जहँ भीतर आग और बाहर पानी